निर्माताओं पर जीएसटी का प्रभाव – भाग 1

Last updated on July 21st, 2017 at 03:07 pm

“मेक इन इंडिया” अभियान ने “निर्माण हब” के रूप में दुनिया के नक्शे पर भारत की छवि को सुधारा है | डेलॉइट के मुताबिक, 2020 के अंत तक भारत के दुनिया में पांचवे सबसे बड़े विनिर्माण देश बनने की पूरी संभावना है।

लेकिन हमारे लिए महत्वपूर्ण बात यह है कि यह विनिर्माण क्षेत्र के लिए चमत्कार करने का वादा करता है – जिसने पिछले 2 दशकों में एक स्थिर चरण देखा है और आईबीईएफ.के अनुसार, वर्तमान में यह हमारे जीडीपी में 16% योगदान देता है। यह, निश्चित रूप से हमारे निर्माताओं के लिए अच्छी खबर है |

लेकिन क्या केवल एक अभियान रातोंरात चीज़ो को बदल देगा ? शायद नही | सरकार के पास “मेक इन इंडिया” को लाने के लिए विचारों का पूरा शस्त्रागार,नवाचार, और रणनीतियों हैं – इसके स्वरुप उन्होंने जीएसटी के रूप में अपने पहले हथियार का शुभ आरम्भ किआ है |

अगर आप एक निर्माता हैं, तो क्या जीएसटी आपके लिए अच्छा या बुरा होगा? जैसा कि आप 1 जुलाई से जीएसटी को गले लगाने के लिए तैयार हैं? क्या कुछ चीजें हैं जिन्हें आपको फिर से सोचने की आवश्यकता होगी?,आइए ढूंढते हैं।

सकारात्मक प्रभाव

उत्पादन की कम कीमत

वर्तमान अप्रत्यक्ष कर शासन के तहत, एक निर्माता अंतरराज्यीय खरीद पर भुगतान किये जाने वाले केंद्रीय बिक्री कर पर टैक्स क्रेडिट का दावा नहीं कर सकता | इसी तरह, अन्य गैर-स्वीकार्य कर जैसे कि औक्ट्रोई , स्थानीय निकाय कर, प्रवेश कर आदि हैं | यह सब उत्पादन की लागत को बढ़ाते है।

यह समस्या विनिर्माण चरण के बाद लगातार जारी रहती है, क्योंकि टैक्स को कैस्केड किया जाता है | निर्माता के समान – वितरक, डीलर और रिटेलर विक्रेता भी अपने इनपुट पर कर क्रेडिट का दावा करने में असमर्थ रहते हैं – जिसके परिणाम स्वरुप अंत उपभोक्ता के लिए माल महंगा हो जाता है | इसका सीधा प्रभाव भारत में निर्मित माल बनाम आयात किए जाने वाले माल में प्रतिस्पर्धा उत्पन्न करता है, और यह अंत में भारतीय निर्माता को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है | संपूर्ण देश में जीएसटी का सबसे बड़ा वरदान है- करों के कैस्केडिंग प्रभावों में कमी |

माल और सेवाओं दोनों के लिए उत्पादन स्तर पर टैक्स सेट-ऑफ करने की अनुमति है – जिससे प्रभावी अप्रत्यक्ष कर को कम करने और निर्माता के लिए एक स्थिर क्रेडिट प्रवाह बनाए रखने में मदद मिलती है | इतना ही नहीं – निर्माता के रूप में, किसी को यह तय करने का तनाव नहीं लेना पड़ेगा कि उसे माल का उपार्जन कहाँ करना है – जीएसटी तस्वीर में आने के साथ, एक निर्माता स्रोत की चिंता किए बिना इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा कर सकता है – चाहे वे स्थानीय, अंतरराज्यीय या आयात हों ( मूल कस्टम ड्यूटी के एकमात्र अपवाद है, जो आयात पर लगाया जाएगा)

अनेक मूल्यांकन विधियों का अंत

वर्तमान में, विनिर्मित सामान उत्पाद शुल्क के अधीन हैं – वर्तमान में विभिन्न तरीकों के आधार पर इसकी गणना की जाती है | कुछ मामलों में – ऐड वालोरम (लेन-देन मूल्य पर) अपनाया जाता है; कुछ मामलों में ऐड क्वांटम (मात्रा पर) अपनाया जाता है; कुछ मामलों में दोनों के संयोजन लगाया जाता है| अधिकांश विनिर्मित सामान एमआरपी मूल्यांकन का पालन करते हैं, जिसमें कर्तव्य की गणना अधिकतम रिटेल मूल्य के निर्दिष्ट प्रतिशत में की जाती है | एमआरपी मूल्यांकन विधियां बेहद अराजक हैं, यह स्तिथि में जटिलता लाती हैं | व्यक्तियों को बेचे गए पैक माल के लिए अलग नियम हैं ,उनके बनाम संस्थानों को बेचे गए पैक माल के लिए अलग तथा कॉम्बो-पैक या प्रचारक पैक के रूप में बेचे गए माल के लिए अलग नियम हैं |

जीएसटी शासन के तहत, निर्माता द्वारा देय जीएसटी की गणना लेनदेन मूल्य के आधार पर की जाएगी | यह कई मूल्यांकन तकनीकों की जटिलता को कम करेगा और एक निर्माता के लिए जीवन सरल बना देगा | केवल एकमात्र संभव अपवाद 2 उत्पादों के उपकर मूल्यांकन होगा, जो हैं – कोयला,जिसकी अधिकतम उपकर की सीमा 400 रुपये / टन है और तंबाकू, जिसकी अधिकतम उपकर की सीमा 4170 रुपये / हजार की छड़ें हैं |

राज्यवर पंजीकरण बनाम फैक्टरीवर पंजीकरण

पहले, एक निर्माता को अपने अनेक कारखानों के लिए अनेक बार पंजीकरण करना होता था, भले ही वे एक ही स्थान या राज्य में उपस्थित हों | उदाहरण के लिए – कर्नाटक में 10 कारखानों वाले एक निर्माता को 10 अलग-अलग बार पंजीयन करना पड़ता था | संक्षेप में, यह किसी भी बड़े आकार का सपना देखने वाले निर्माता के लिए एक अनुपालन दुःस्वप्न था |, लेकिन जीएसटी शासन में, क्योंकि कर योग्य घटना आपूर्ति पर निर्भर है, एक निर्माता अब एक ही राज्य में सभी 10 इकाइयों के लिए एक पंजीकरण कर सकता है | इसलिए एक राज्य में कर योग्य निर्माता के लिए कोई और अलग पंजीकरण नहीं है|

आर्थिक कारकों के आधार पर आपूर्ति श्रृंखला का पुनर्गठन

मौजूदा शासन में, करों का भुगतान करने की सुविधा के आधार पर व्यवसाय और आपूर्ति श्रृंखलाएं आम तौर पर संरचित की गई हैं। जीएसटी में आने के साथ, एक निर्माता महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करने में सक्षम होगा | व्यावसायिक दक्षता – और भंडारण संबंधी निर्णय परिचालन और आर्थिक कारकों पर पर किए जा सकतें है जैसे कि लागत, स्थान के फायदे, महत्वपूर्ण ग्राहकों की निकटता आदि | वास्तव में, अब उत्पादक माल और सेवा की अंतर-राज्य आपूर्ति पर इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा कर सकते हैं, हम अच्छी तरह से देख सकते हैं कि सप्लाई चेन में पूरे गोदामों का सफाया हो रहा है – जिससे लागत पर अधिक लाभ होता है |

वर्गीकरण विवादों में कमी

वर्तमान में, विभिन्न उत्पादों पर उत्पाद शुल्क और वैट के विभिन्न दरों के कारण, साथ ही उत्पाद शुल्क और वैट विधेयकों के तहत प्रदान किए गए कई छूट के कारन , वर्गीकरण विवाद, केंद्रीय उत्पाद शुल्क और वैट दोनों के तहत मुकदमेबाजी का एक नियमित कारण है। विशेषकर विनिर्माण क्षेत्र के लिए | जीएसटी – जो की सरलीकृत दर संरचना पर काम करता है और छूटों को कम करता है – इसकी स्थापना के साथ उत्पादों के वर्गीकरण के संबंध में विवादों में महत्वपूर्ण कमी आएगी |

कोई दोहरा नियंत्रण नहीं

वर्तमान शासन में, एक निर्माता को दोहरे नियंत्रण के अधीन है – क्योंकि वह विशेषकर एक्साइज के लिए केंद्र और वैट के लिए राज्य द्वारा मूल्यांकित किया जाता है। जीएसटी युग में भी, क्योंकि एक निर्माता दोनों सीजीएसटी और एसजीएसटी का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होगा – एक वास्तविक चिंता है कि एक निर्माता को दोहरे मूल्यांकन से गुज़ारना पड़ेगा | दोहरे नियंत्रण के इस पहलू पर राज्य और केंद्र दोनोंके बीच गहराई से चर्चा और बहस हुई है | हालांकि, दोहरे नियंत्रण से बचने के लिए सरकार जनवरी 2017 में आम सहमति पर पहुंच गयी | प्रस्तावित जीएसटी शासन के तहत, 1.5 करोड़ रुपये या इससे कम के कारोबार वाले 90% लोगों की जांच और मूल्यांकन, राज्य प्राधिकरणों द्वारा किआ जाएगा, और शेष 10% केन्द्र द्वारा किआ जाएगा | उस सीमा के ऊपर, केंद्र और राज्य 50:50 अनुपात में मूल्यांकन करेंगे | यह कदम निश्चित रूप से छोटे व्यापारियों के हितों की रक्षा के लिए पर्याप्त रूप से लंबा रास्ता तय करेगा और जीएसटी संक्रमण को सरल और प्रभावशाली बना देगा।

कुल मिलाकर, एक निर्माता के लिए जीएसटी कई तरीकों से बेहतर है – जिनमे सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कारोबार करने में आसानी होती है और कई मोर्चों पर लागत कम लगती है | लेकिन, क्या इसके लिए भी पहलुओं को देख सकते हैं? इस विषय पर अधिक चर्चा हमारे अगले ब्लॉग में की जाएगी

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Pugal T & Pramit Pratim Ghosh

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